My favourite poetry
Urdu, Hindi, Sanskrit, English, Greek and Latin - all the poetry that has touched me.
© V. Ravi Kumar. All rights reserved.
Wednesday, January 14, 2009
कोई इस ज़ख़्म का मरहम नहीं है
किनारा दूसरा दरिया का जैसे
वो साथी है, मगर मेहरम नहीं है
मैं तुम को चाह कर पछता रहा हूं
कोई इस ज़ख़्म का मरहम नहीं है
अमजद इस्लाम अमजद
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