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Tuesday, January 12, 2010

ख़्वाब था जो देखा जो सुना अफ़साना था

वाए नादानी कि वक़्ते मर्ग ये साबित हुआ

ख़्वाब था जो देखा जो सुना अफ़साना था

दर्द

Friday, September 26, 2008

कुछ दर्द कलेजे से लगाने के लिये हैं

अशआर मेरे यूं तो ज़माने के लिये हैं
कुछ शेर फक़त तुझ को सुनाने के लिये हैं

अब ये भी नही ठीक के हर दर्द मिटा दें
कुछ दर्द कलेजे से लगाने के लिये हैं

ये इल्म का सौदा ये रिसाले ये किताबें
इक शख़्स की यादों को भुलाने के लिये हैं

जां निसार अख़्तर