मैं अकेला ही चला था जानिबे मंज़िल मगर
ग़ैर साथ आते गये और कारवाँ बनता गया
दहर में 'मजरूह' कोई जाविदां मज़मूं कहां
मैं जिसे छूता गया वो जाविदां बनता गया
मजरूह सुल्तानपुरी
Urdu, Tamil, Kannada, Hindi, Sanskrit, English, Greek and Latin - all the poetry that has touched me.
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Friday, September 18, 2009
Friday, August 28, 2009
तेरा हाथ हाथ में आ गया के चराग़ राह में जल गये
मुझे सहल हो गयी मंज़िलें वो हवा के रुख़ भी बदल गये
तेरा हाथ हाथ में आ गया के चराग़ राह में जल गये
मजरूह सुल्तानपुरी
Wednesday, August 26, 2009
रक्स करना है तो फिर पाँव की ज़ंजीर न देख
देख ज़िन्दां से परे रंगे चमन जोशे बहार
रक्स करना है तो फिर पाँव की ज़ंजीर न देख
मजरूह सुल्तानपुरी
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