बे वक़्त अगर जाऊंगा सब चौंक पड़ेंगे
इक उम्र हुई दिन में कभी घर नहीं देखा
जिस दिन से चला हूं मेरी मंज़िल पे नज़र है
आंखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा
पत्थर मुझे कहता है मिरा चाहने वाला
मैं मोम हूं उसने मुझे छूकर नहीं देखा
बशीर बद्र्
Urdu, Tamil, Kannada, Hindi, Sanskrit, English, Greek and Latin - all the poetry that has touched me.
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Thursday, October 9, 2008
Wednesday, September 17, 2008
मंज़िल तमाम उम्र हमें ढूंढती रही
सिर्फ़ एक क़दम उठा था ग़लत राह्-ए-शौक़ में
मंज़िल तमाम उम्र हमें ढूंढती रही
अब्दुल हमीद अदम
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