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Thursday, October 9, 2008

जिस दिन से चला हूं मेरी मंज़िल पे नज़र है

बे वक़्त अगर जाऊंगा सब चौंक पड़ेंगे
इक उम्र हुई दिन में कभी घर नहीं देखा

जिस दिन से चला हूं मेरी मंज़िल पे नज़र है
आंखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा

पत्थर मुझे कहता है मिरा चाहने वाला
मैं मोम हूं उसने मुझे छूकर नहीं देखा

बशीर बद्र्

Wednesday, September 17, 2008

मंज़िल तमाम उम्र हमें ढूंढती रही

सिर्फ़ एक क़दम उठा था ग़लत राह्-ए-शौक़ में

मंज़िल तमाम उम्र हमें ढूंढती रही

अब्दुल हमीद अदम