© V. Ravi Kumar. All rights reserved.

Page copy protected against web site content infringement by Copyscape

Sunday, April 26, 2026

Jaan Nisaar Akhtar

 तजज़िया

जाँ निसार अख़्तर


मैं तुझे चाहता नहीं लेकिन 


फिर भी जब पास तू नहीं होती 


ख़ुद को कितना उदास पाता हूँ 


गुम से अपने हवास पाता हूँ 


जाने क्या धुन समाई रहती है 


इक ख़मोशी सी छाई रहती है 


दिल से भी गुफ़्तुगू नहीं होती 


मैं तुझे चाहता नहीं लेकिन 


मैं तुझे चाहता नहीं लेकिन 


फिर भी रह रह के मेरे कानों में 


गूँजती है तिरी हसीं आवाज़ 


जैसे नादीदा कोई बजता साज़ 


हर सदा नागवार होती है 


इन सुकूत-आश्ना तरानों में 


मैं तुझे चाहता नहीं लेकिन 


मैं तुझे चाहता नहीं लेकिन 


फिर भी शब की तवील ख़ल्वत में 


तेरे औक़ात सोचता हूँ मैं 


तेरी हर बात सोचता हूँ मैं 


कौन से फूल तुझ को भाते हैं 


रंग क्या क्या पसंद आते हैं 


खो सा जाता हूँ तेरी जन्नत में 


मैं तुझे चाहता नहीं लेकिन 


मैं तुझे चाहता नहीं लेकिन 


फिर भी एहसास से नजात नहीं 


सोचता हूँ तो रंज होता है 


दिल को जैसे कोई डुबोता है 


जिस को इतना सराहता हूँ मैं 


जिस को इस दर्जा चाहता हूँ मैं 


इस में तेरी सी कोई बात नहीं 


मैं तुझे चाहता नहीं लेकिन 


मैं तुझे चाहता नहीं लेकिन 

No comments:

Post a Comment